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संतोष अलेक्स की कविताएँ

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बौना   बालकोनी में बैठकर   चाय की चुस्‍की लेते वक्‍त अचानक नजर पडी बोनसाई पर यूं तो यह आकार में है बौना मगर है आकर्षक जरूर दसवीं मंजिल से सामने के घर दिखते हैं बौने हमारे फलैट का चौकीदार है बौना बौने हैं उसकी पत्‍नी , बच्‍चे व इच्‍छाएँ वामन को वरदान दे महाबली भी हो गया बौना बौना है कमरे की चारदीवारी में कैद झूठी शान में जीता आदमी वह आदमी नहीं बोनसाई हो चुका है........ **** इंतज़ार है ( अग्निशेखर जी के लिए ) कश्‍मीरी पंडित अब कश्‍मीर में नहीं रहते वे मिल जाऐंगे दिल्‍ली इलाहाबाद या गाजियाबाद में इनकी संपत्ति हड़प ली गई पुरूषों की हत्‍या हुई स्त्रियों से बलात्‍कार … जो बचे थे उन्‍हें कश्‍मीर छोड़ना पड़ा घाटी में उनके घर की चिमनियों से धुँआ उड़ता था बच्‍चे घूमा फिरा करते थे उड़ रहा है धुँआ अब बारूद का घूम रहे हैं आतंकवादी घूम रही है टुकड़ी सेना की डल झील चिनार के पेड़ घाटी सब चुप हैं चुप हैं हवाएं दिशाएं बेघर हैं वे दशकों से अब न पन ध्‍युन 1 ही मनाया जाता है न हेरथ 2 ही उस तरह इंतज़ार है नवरेह 3 पर्व पर कश्‍मीर ...