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कविता आज सुबह

जॉन हेन्स कविताएँ

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नींद

चाहे सो जाएँ चाँद के तले
बंजारों की तरह, अपनी जेब में
चांदी के सिक्के लिए हुए,
या रेंगकर गहरे चले जाएँ किसी कंदरा में
जिसमें से गुनगुने, रोयेंदार चमगादड़
खीसें काढ़ते हुए भरते हैं उड़ान,
या पहन लें एक बड़ा काला कोट
और बस अंधकार में कर लें कूच,

हम बन जाते हैं आख़िरकार पेड़ों की तरह
जो खड़े रहते हैं ख़ुद के बीच,
सोच में डूबे।

और जब हम जाग जाते हैं
— अगर जागना होता भी है —
तो लौट आते हैं एक एकाकी बचपन की
छवियाँ लिए हुए — हाथ
जो हमने थामे थे, धागे जो हमने खोले थे
अपने नीचे की परछाइयों से,
और ध्वनियाँ गोया किसी और
कमरे से आती हुई आवाज़ें
जहाँ हमारे जीवन का कोई हिस्सा
रचा जा रहा था — जिसके पास हम लेटे हुए थे,
इस इंतज़ार में कि अपना जीवन शुरू हो।




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पहाड़ पर

लंबी निष्क्रियता से उबरकर हम चले,
खड़ी ढाल वाली चरागाह पर झुकते हुए,
सरसफलों की खोज में,
फिर लाल हो रही धूप में ही
हवा के थपेड़े खा रहे पहाड़ की धार से
गुज़रते हुए गए ऊपर।

एक परछाईं हमारे पीछे-पीछे
पहाड़ पर चली आई,
उगते हुए काले चाँद की तरह.
ढाल पर पतझर की बत्तियाँ
मिनट-दर-मिनट बुझ गईं।

हमारे आसपास हवा और पत्थर

वोला घापेएवा की कविताएँ

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कि तुम ठहरे पेड़
और हवा ने तज दिया है तुम्हें

खड़े रह सकते हो तुम सदियों तक अचल
और तुम्हारे मन को सुहाता नहीं
पंछियों का कलरव भी

कि तुम एक पेड़ ठहरे
जिसे तज दिया है हवा ने





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मैं जागती हूँ गैरों की घड़ी के अलार्म से मैं फिर से लिखती हूँ गैरों का लिखा मैं सोचती रहती हूँ गैरों के मृतकों के बारे में मैं मिलती हूँ गैरों के दोस्तों से मैं बोलती हूँ गैरों की भाषाएँ मैंलेती हूँ अपनी तस्वीर गैरों के बच्चों के साथ मैं सहलाती हूँ गैरों की बिल्लियों को मैं किसी के कमरों में नहींरहती मैं किसी की किताबें नहीं पढ़ती मैं किसी के कांटे से नहीं खाती और ना ही इस्तेमाल करती हूँ किसी का चाकू मैं किसी का कंबल ओढ़ कर नहीं सोती मैंने इसी तरह सीखा है मेहमान बनना इस गैरों और किसी की नहीं दुनिया में कि बाद में जब मेरा स्वागत नहीं होगा मैं मर सकूँगी अपनी ही मौत से।


अंग्रेजी से अनुवाद - मोहन राणा 



वोला घापेएवा/Volya Hapeyeva/Вольга Гапеева
[1982,मिन्स्क:बेलारूस] कवि, विचारक, अनुवादक और भाषाविद् हैं। 
कविता, गद्य और नाटक के अलावा कभी-कभी बच्चों के लिए किताबें
लिखती हैं। वोला की…

मंदाक्रांता सेन की कविताएँ

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रास्ता

तुम्हारी आँखों के भीतर
एक लंबा रास्ता ठिठका हुआ है
इतने दिनों तक मैं उसे नहीं देख सकी
आज जैसे ही तुमने नज़रें घुमाई
मुझे दिखाई दे गया वह रास्ता।
बीच-बीच में तकलीफ़ झेलते मोड़
रास्ते के दोनों ओर थे मैदान
फ़सलों से भरे खेत
वे भी जाने कब से ठिठके हुए थे
यह सब तुम्हें ठीक से याद नहीं
आँखों के भीतर एक रास्ता पड़ा हुआ था
सुनसान और जनहीन।
दूसरी ओर
कई योजन तक फैला हुआ है कीचड़
वहाँ रास्ता भी व्यर्थ की आकांक्षा-जैसा मालूम होता है
कँटीली झाड़ियाँ और नमक से भरी है रेत,
कहीं पर भी ज़रा-सी भी छाया नहीं
इन सबको पार कर जो आया है
क्या तुम उसे पहचानते हो?
वह अगर कभी भी राह न ढूँढ़ पाए
तो क्या तुम उससे नहीं कहोगे
कि तुम्हारी आँखों में एक रास्ता है
जो उसका इंतज़ार कर रहा है?



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लज्जावस्त्र

रास्ते से जा रही हूँ
और मेरे वस्त्र खुलकर गिरते जा रहे हैं
मैं नग्न हुई जा रही हूँ माँ!
और आखि़र घुटनों के बल बैठ जाती हूँ
दोनों हाथों से जकड़ लेती हूँ
दोनों घुटनों को,
छुपा लेती हूँ अपना चेहरा
अपना पेट अपना सीना
खुली पीठ पर अनगिनत तीर बिंधने लगते हैं
माँ, यकृत तक को तार-तार …

नरेश शांडिल्य की कविताएँ

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पेड़ : कुछ दोहे


पेड़ चिड़ी का घौंसला, साँसों का मधुगीत।
हारे-हारे पाँव का, हरियाला संगीत।।

छाया मन ऐसी बसी, ज्यों कोयल मन आम।
मरुथल मन उद्यान ज्यों, दशरथ के मन राम।।

पीपल फैला दूर तक, इक पनघट के पास।
थका हुआ सूरज रुका, लगा बुझाने प्यास।।

कटे हुए हर पेड़ से, चीख़ा एक कबीर।
मूरख कल को आज की, आरी से मत चीर।।

इक दिन जब मर जाएँगे, पेड़ लगा कर फाँस।
लिए कटोरा घूमना, माँगा करना साँस।।



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आलोचक


उसने मेरे पसीने को पानी कहा
मैं चुप रहा

उसने मेरे आँसू को पानी कहा
मैं चुप रहा

उसने मेरे ख़ून को पानी कहा
मैं चुप रहा

लेकिन जब उसने
अपनी लार को भी लावा कहा
तो मैं चुप नहीं रहा

अपनी कसी हुई मुट्ठियों
और भिंचे हुए दाँतों के साथ
मैं मुड़ा
मुस्कुराया
और चल दिया आगे

अब मेरी कविता को
उस आलोचक की
कोई दरकार नहीं है ...




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ग़ज़ल


ग़ज़ल है तू , तो गाना चाहता हूँ
सरापा तुझको पाना चाहता हूँ

तेरे पहलू में काटूँ उम्र सारी
कोई ऐसा बहाना चाहता हूँ

मेरे भीतर में फैली गूँज है तू
तुझे सबको सुनाना चाहता हूँ

मुसलसल चुप्पियों के दौर में मैं
फ़लक सर पर उठाना चाहता हूँ

क़रीने से सजा कर दिल के टुकड़े
मैं सारे…

रिकार्डो डॉमनिक की कविताएँ

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कवि ने अपने प्रेमी का पच्चीसवाँ जन्मदिन मनाया
(यानिस ब्रेसनर के लिए)

तुम्हारे जीवन से भी लम्बी लड़ाईयाँ हो चुकी हैं
मैं तुम्हें बधाई देता हूँ
आज सफलता से
एक जिराफ़ या चमगादड़
बूढ़ी गाय,
अजगर,
या उल्लू से ज्यादा लम्बा जीवन जीने की।
दुनियाभर में पेंगुइन और सुअर मर रहे हैं
जिस पल तुम गर्भस्थ हुए उसी समय वे भी हुए ।
जब तुम एक निषेचित डिंब भर ही थे
एक परिक्रमा भी पूरी नहीं की है तब से शनि ग्रह ने अब तक सूरज की
पर मुझे गाइड करता है स्टॉकर ज़ोन को जाते हज़ारों रास्तों,
रेंग कर पास आने लगा है एक और जाड़े का मौसम,
मैं छुपाना चाहता हूँ
तुम्हारे चिकने सीने में अपना चेहरा।
अगर मैं कर पाता तो हमारे भविष्य के रात और दिनों की पटकथा लिखने के लिए
लेम या स्त्रूगास्की भाईयों से मैं एक करार करता;
साउंडट्रैक के लिए मैं दियामांदा गालास से करार करता
जो गाती अपनी धौंकती और मिमियाती,
कर्कश और घुरघुराती आवाज़ में
और हम पापाचार में लिप्त रहते हैं।
मैं जश्न मनाता हूँ
तुम्हारे बालों के नीचे दिमाग का,
तुम्हारे शरीर से जुड़े तने लिंग का,
तुम्हारा ही समकालीन एक सुअर अब
पहुँच गया है अपने चर्बी चढ़े जीवन की बुलंदी पर ,
थक चुके आखिर हम एक …

स्तांका हर्स्तलेज़ की कविताएँ

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स्लोवेनियन कविता




मां 


मैं उसे प्यार करती हूँ इसके कुछ कारण हैं
पर हालात बहुत बेढब हैं
वह पंसारी की दुकान चली जाती है और तुम्हें  पता ही नहीं रहता
और तुम खोजते रहते हो और उसे खोजते ही रहते हो घर में,
इसी तरह हम खोजते थे पिताजी को भी


जिन कमरों में ट्यूबें लगीं होती थीं उनमें हम ख़ासकर खोजते थे
उसके भाई ने रेडिएटर से लटक कर
उसके जीजा ने पानी के पाइप से लटक कर ख़ुदकशी की थी
महीनों तक हम उसे खोजते रहे लेकिन वह कहीं नहीं मिला

तुम माँ को खोजते रहते हो,लेकिन किसी लाश को नहीं खोजते
पर एक ज़िंदा दिल को खोजते हो
जिसके झुर्राये कोमल हाथ अभी भी हमें कभी कबार सहलाते हैं
लेकिन तुम उसे ढूँढ नहीं पाते हो
बस एक विशाल ठंडा घर
जिसके मुँह बाये खाली कमरे
निगल जाना चाहते हैं तुम्हें
तुम व्याकुल पड़े रहते हो जब तक वह लौट ना आए






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गर्व


मुझे पसंद है जिस तरह डॉक्टरों के झुंड के बीच
मेरे पिता कूच कर जाते हैं एक मुखिया नर गोरिल्ला की तरह
जिनके चोगों से भी ज्यादा सफ़ेद हैं उसके बाल

डॉक्टर मेरे पापा की बहुत इज्जत करते हैं
वे कहते हैं: जनाब,हमें कुछ कहना है आपसे
हमारे पास एक निदान है…

अज़िता कहरमान की कविताएँ

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मैंने जिया


वे तमाम आदमी और औरतें जिनका जीवन मैंने जिया
उनकी नींदें जिनमें मैंने देखे सपने
उनके सपने जिन्हें मैंने जिया

उनका दुख जो बचा रह गया मेरे रोने के लिए,
वे तराने, हवाएँ और बुदबुदाते जाप
अब फुसफुसाते हैं मेरे बीतते समय में....

वे औरतें जिनका जीवन मैंने जिया
वीरान जगहों में
वे निशान जिन्हें हवा उड़ा ले गई
तुम्हारी आँखें और अनगिनत चेहरे
तुम्हारी सूरत और मेरी आँखें

वे कलेवर जिन्हें  मैंने जिया
चीड़ के पेड़,पत्थर और कबूतर
कबूतर, पत्थर और चीड़ के पेड़

मैं ही थी गिरती हुई सारी बरफ़
उमड़े समुंदर थे जो तुम्हारे भीतर,
किसी और के रास्ते थे मेरे पैर
किसी और के पैर और तुम्हारे रास्ते

वे सारे गीत जो मैंने गाये
तुम्हारे मुँह से
सारे आदमियों और औरतों के चेहरे पर
जिनका जीवन मैंने जिया




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समुंदर



कोई आ सकता है क्या
इस तट पर एक निशान लगाने
और कहने कि यहाँ दुनिया का अंत है?

मैं सोना चाहती हूँ
समुंदर के शब्दों पर
नुक़्तों और रेत पर

कोई आ सकता है क्या
और जो हटा सके उन्हें जो नमक का खंभा बन गए थे
पलट देख एक झलक अनुपस्थित प्रदेश की,
और क्या कोई कम कर सकता है इन दूरियों को?
अपनी नग्नता के साथ
मैं सो जाना चाहती हूँ
पक्षियों के को…