सरिता जेनामाणि की कविताएँ






दरवाज़ा

मैं दस्तक देती हूँ दरवाज़े पर
और खुलता है दरवाज़ा
लेकिन इस से पहले कि मैं भीतर प्रवेश करूँ
दरवाज़ा प्रवेश कर जाता है मेरे भीतर
और खुलते चले जाते हैं अनगिनत दरवाज़े
मेरे भीतर
मैं तय नहीं कर पाती
कि मैं दहलीज़ों को पार कर रही हूँ
या वे मुझे पार कर रही हैं ?
चकराकर , मैं ढूंढती हूँ कोई छत
लेकिन इस से पहले कि मैं उसे पाऊँ
ख़िसक जाती है पांवों के नीचे से ज़मीन



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विएना के  कॉफीहॉउस

शाम ढलते ही
जी उठते हैं इस शहर के कॉफी हॉउस
उदासीनता की खनखनाहट के साथ

बढ़ती है धीरे-धीरे
एकांत की भीड़
मेज़ों के चारों तरफ़


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उधर, उस तरफ़


निःस्तब्धता फैलाती है पंख
मरुस्थल की तरह
तड़के से उज्ज्वल होते आकाश तले
और दमकते हैं पक्षाघातग्रस्त पिरामिड
नभोनील और स्वर्णिम रंगों के मिश्रण से
अभी बहत कुछ शेष है
कहने को
सभ्याताओं से परे



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प्रवास

जीवन-भर
एक अनन्त यात्रा
चलती है साथ-साथ
और किसी लक्ष्य की अनुपस्थिति में
कितना कुछ खो जाता है
भीतर से
और टूटता-फूटता रहता है
अस्तित्व का ताना-बाना




सरिता जेनामाणि द्विभाषी कवि हैं।
सरिता का नया संग्रह इस साल प्रकाशित
हो रहा है।
सरिता विएना में रहती हैं।





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